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Monday, April 10, 2017

मर्यादा पुरूषोंत्तम राम के रूप में किये इस कर्म का फल श्री हरी विष्णु को कृष्ण रूप में अपना जीवन देकर भुगतना पड़ा था । धर्म से जुड़ी सच्ची पौराणिक जानकारी

मर्यादा पुरूषोंत्तम राम के रूप में किये इस कर्म का फल श्री हरी विष्णु को कृष्ण रूप में अपना जीवन देकर भुगतना पड़ा था । धर्म से जुड़ी सच्ची पौराणिक जानकारी



मर्यादा पुरूषोंत्तम राम के रूप में किये इस कर्म का फल श्री हरी विष्णु को कृष्ण रूप में अपना जीवन देकर भुगतना पड़ा था । धर्म से जुड़ी सच्ची पौराणिक जानकारी
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रामायण काल में जब रावण माता सीता का अपहरण करके ले गया तो भगवान राम उनकी खोज में लगे हुये थे । इस क्रम में उनकी भेंट सुग्रीव से हुयी थी । सुग्रीव के बड़े भाई बाली नें सुग्रीव की पत्नी को अपने पास रख रखा था और उसको राज्य से निकाल दिया था । सुग्रीव ने भगवान राम से वचन रखा कि वह बाली का वध करके उसकी पत्नी और राज्य को वापस दिलवायें तो वह खुद अपनी सेना लेकर भगवान राम का साथ देगा । बाली को वरदान मिला हुआ था कि जो भी उससे युद्ध करता था तो सामने वाले का आधा बल बाली के अन्दर आ जाता था । इस कारण भगवान राम ने सुग्रीव से कहा कि वह बाली को मल्लयुद्ध के लिये ललकारे और युद्ध के दौरान राम बाली को मार देंगे । सुग्रीव ने ऐसा ही किया और मल्लयुद्ध के दौरान पेड़ के पीछे से बाण चलाकर बाली को मौत के घाट उतार दिया । चूंकि राम उसके सामने नही जा सकते थे क्योकि अगर राम बाली के सामने जाते तो राम का आधा बल बाली में चला जाता और राम बाली को नही मार पाते, इसलिये राम को पेड़ की ओट में से तीर चलाना पड़ा ।
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युग बीत गया और द्वापर युग आ गया । द्वापर युग में श्री हरी विष्णु नें श्री कृष्ण का रूप धरकर मृत्युलोक पर अपनी लीलायें की थी । धीरे धीरे द्वापर युग भी समाप्ति की कगार पर था और गांधारी के श्राप के कारण यदुवंश भी धीरे धीरे समाप्त हो रहा था और गांधारी के श्राप के कारण श्री कृष्ण को पूरे यदुवंश को अपने सामने खत्म होते देखना था । व्यथित श्री कृष्ण एक दिन एक पीपल के पेड़ के नीचे योग निंद्रा में लेटे थे । कुछ ही दूरी पर एक जरा नाम का बहेलिया हिरण का शिकार करने को झाड़ी कि ओट में घात लगाकर बैठा था । दूरी से उस बहेलिये को श्री कृष्ण का पैर दिखायी दिया और प्रभु लीला के वश में उसको श्री कृष्ण का पैर देखकर हिरण का पैर होने का भ्रम हुआ । उसने कमान पर तीर चढ़ाया और सीधा श्री कृष्ण के पैर में मार दिया । अपने शिकार को उठाने को ज्यों ही वो वहॉ पहुँचा तो श्री कृष्ण को देखकर क्षमा-याचना करने लगा । तब श्री कृष्ण नें कहा " डरो नही बहेलिये, जो कुछ भी हुआ है मेरी ही मर्जी दे हुआ है । मै ही त्रेता का राम हूँ और तुम त्रेता के बाली हो । त्रेता युग में मैनें पेड़ की ओट से तुम्हे मारा था और आज झाड़ी की ओट से तुम्हे अपने प्राण देकर मैनें तुम्हारा कर्ज चुका दिया है । अब तुम मेरी कृपा से स्वर्गलोक को प्राप्त करोगे । "
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इस तरह भगवान श्री कृष्ण की लीलायें मानव देह में पूरी हुयी थी । इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि कर्मों का फल सभी को भोगना पड़ता है, देवता हो या मनुष्य अथवा पशु-पक्षी । जीवन सदिया और युग बीत जाते हैं किंतु हमारे कर्म तब तक हमारे साथ रहते हैं जब तक उनका फल हमको नही मिल जाता है ।